Monday, 12 October 2026 LATEST NEWS • BEYOND LIMITS
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Business News: बिजली बिल घटाने के लिए बड़ा कदम उठा रहीं कंपनियां, ग्रीन एनर्जी से होगी लाखों-करोड़ों की बचत?

नई दिल्ली: बिजली की बढ़ती लागत के बीच भारत की कई बड़ी कंपनियां अब अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए सोलर और दूसरी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं का सहारा ले रही हैं। इसका मकसद बिजली पर होने वाला खर्च कम करना, सप्लाई को अधिक भरोसेमंद बनाना और पारंपरिक ऊर्जा पर निर्भरता घटाना है।

11 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, स्टील, सीमेंट, ऑटोमोबाइल और कमर्शियल रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों की कंपनियां अपनी जरूरत के मुताबिक ग्रीन पावर खरीदने या खुद बिजली पैदा करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

आखिर क्या है कंपनियों की नई रणनीति?

कंपनियां अब केवल बिजली वितरण कंपनियों से बिजली खरीदने पर निर्भर रहने के बजाय अपने कारखानों और कार्यालयों के लिए सोलर प्लांट लगा रही हैं। कुछ कंपनियां नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश कर रही हैं, जबकि कुछ लंबे समय के बिजली खरीद समझौतों के जरिए अपनी जरूरत पूरी कर रही हैं।

इस मॉडल को कैप्टिव पावर कहा जाता है। इसमें बिजली मुख्य रूप से कंपनी के अपने इस्तेमाल के लिए पैदा की जाती है या उसकी आपूर्ति की व्यवस्था की जाती है।

बिजली की लागत में कितना अंतर हो सकता है?

मीडिया रिपोर्ट में JMK Research और उसके सहयोगियों के 2026 के अध्ययन का हवाला देते हुए बताया गया है कि कुछ राज्यों में नवीकरणीय ऊर्जा से मिलने वाली बिजली की लागत करीब 4.5 से 6 रुपये प्रति यूनिट रही, जबकि ग्रिड बिजली की दरें 7 से 8 रुपये प्रति यूनिट के आसपास थीं।

हालांकि, वास्तविक बचत राज्य, बिजली समझौते, ट्रांसमिशन शुल्क, स्टोरेज और परियोजना की लागत पर निर्भर करती है। इसलिए हर कंपनी के लिए बचत एक जैसी नहीं होगी।

UltraTech, JSW Steel और Ambuja Cement भी कर रहे हैं निवेश

रिपोर्ट के अनुसार, UltraTech Cement के पास लगभग 2 गीगावाट की कैप्टिव नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता है। JSW Steel की ऐसी क्षमता करीब 1 गीगावाट बताई गई है, जबकि Ambuja Cements के पास लगभग 980 मेगावाट की क्षमता है।

JSW Steel और Tata Steel की अतिरिक्त परियोजनाएं भी पाइपलाइन में हैं। इससे पता चलता है कि बड़े औद्योगिक समूह बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए दीर्घकालिक ऊर्जा योजनाओं पर जोर दे रहे हैं।

Maruti Suzuki और Tata Motors भी बढ़ा रही हैं ग्रीन एनर्जी का इस्तेमाल

ऑटोमोबाइल क्षेत्र में भी यह बदलाव दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, Maruti Suzuki अपने कारखानों में सोलर बिजली और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ा रही है। कंपनी ने वित्त वर्ष 2030-31 तक अपनी विनिर्माण इकाइयों में नवीकरणीय बिजली की हिस्सेदारी 85 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य बताया है।

वहीं, Tata Motors भी सोलर, कैप्टिव और हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के जरिए अपनी बिजली जरूरतों को पूरा करने की दिशा में काम कर रही है।

आम कारोबार और उद्योगों पर क्या होगा असर?

बिजली किसी भी फैक्ट्री के संचालन की प्रमुख लागतों में से एक होती है। यदि कंपनियां लंबे समय तक कम लागत पर बिजली की व्यवस्था कर पाती हैं, तो उनके परिचालन खर्च पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।

इसके अलावा, अपनी ऊर्जा आपूर्ति पर बेहतर नियंत्रण मिलने से बिजली की दरों में उतार-चढ़ाव का जोखिम भी कम हो सकता है। हालांकि, सोलर और पवन ऊर्जा की उपलब्धता मौसम पर निर्भर करती है, इसलिए चौबीसों घंटे बिजली की जरूरत वाले उद्योगों को बैकअप और अतिरिक्त सप्लाई की व्यवस्था भी करनी पड़ती है।

आगे क्यों बढ़ सकती है ग्रीन एनर्जी की मांग?

ऊर्जा लागत, पर्यावरणीय लक्ष्यों और सप्लाई की विश्वसनीयता को देखते हुए कंपनियों के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का महत्व बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में निवेश बढ़ने की संभावना है, लेकिन इसकी रफ्तार सरकारी नीतियों, परियोजना लागत और तकनीकी विकास पर भी निर्भर करेगी।

निष्कर्ष: भारत की बड़ी कंपनियों के लिए ग्रीन एनर्जी अब केवल पर्यावरण बचाने का विकल्प नहीं रह गई है। यह बिजली खर्च को नियंत्रित करने और कारोबार को अधिक टिकाऊ बनाने की रणनीति भी बन रही है।

डिस्क्लेमर: यह खबर प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों और उपलब्ध व्यावसायिक जानकारी पर आधारित है। लागत और ऊर्जा क्षमता से जुड़े आंकड़े संबंधित रिपोर्ट के अनुसार हैं। वास्तविक परिणाम कंपनी और परियोजना के आधार पर अलग हो सकते हैं।

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